ज़ेवर

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नज़्म के इंतज़ार में गुज़र रही है रात अकेली..
मन ही मन मुझे कोस रही है..
कुछ दिन पहले ही तो
वादा किया था मैंने..
उसकी सहेली उसको जरूर मिलेगी..

पिछली दफा अमावस को जब मिलीं थी दोनों
खिलखिलाती हँसी से
कमरा भर गया था मेरा..
बहोत झूमी नाचीं थी मिलकर
मुझे भी जबरदस्ती से नचाया था

नज़्म ने जो लफ्ज़ों के ज़ेवर पहने थे,
रात उन्हें आँखों से सहला सहलाकर देखती थी
उसके दामन का एक छोटा सा लम्हा
दबे पाँव मेरे पास आकर गुदगुदी करता था
और फिर अचानक से गायब होता था

उन दोनों की गपशप खत्म ही नहीं होती थी
मुश्किल से कोई बहाना बनाकर
रात को समझा बुझाकर,
मैं नज्म को डायरी में आराम करने को कहता,
ताकि मैं चैन की नींद ले सकूँ..

आज..पंद्रह दिन बाद…मामला गड़बड़ है..
कोई नज़्म के ज़ेवरात चोरी कर गया है..
मेरी बेबसी मुझे खाए जा रही है..
सारे हर्फ़ किसी ने लूट लिये हों जैसे,
सोचों की तख्तें खाली नजर आ रही हैं..
रात का गुस्सा नाक पर है..जो जायज़ है..

झन्नाकर मैं गैलरी में पहुँचता हूँ..और…
और अब क्या कहना..
रात की आँखों से बचकर
बदमाश चाँद सारे ज़ेवरात सजाए बैठा है..!!
बेचारी रात को आज खाली हाथ ही गुजरना होगा…!!

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4 thoughts on “ज़ेवर

  1. वाह !!! या कवितेत सगळीकडे गुलझार सांडला आहे. त्या दर्जाचे लेखन आहे हे आशफाक…नज्म आणि रात यांची मैत्री.. काय भन्नाट कल्पना आहे ही.. आणि शेवट तर…लाजवाब…
    यावरून मला काहीतरी आठवलय… भेटल्यावर बोलूच… Bravo !!!

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  2. धन्यवाद भावा…!!जिंदगी ने बिछाए काँटों के बीच जो गुलों के इत्र की खुशबू महसूस कर रहा हूँ..उसका काफी बड़ा हिस्सा उस फरिश्ते की देन ही है..थैंक्स फॉर यॉर काइंड वर्ड्स!!

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