सरहदें

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आम नजरिये से तो,
सियासत की खींची लकीरें हैं..
पर..लकीरों में ही तो मिलते हैं,
हर्फ़..लफ्ज़..जुमले..
इन्हें अहसासों के ऐनक से देखना..
कभी वक़्त मिले..
तो मुल्क़ के किसी भी कोने में झाँक कर आना..
सरहदों से गुफ़्तगू कर के आना..
वो बोलती हैं..
मुख़्तसर ही सही..वो बोलती हैं..!

उनकी आवाज़ों में…
शहादत के रंग कैद हैं..
बंदूकों गोलियों का चीखना चिल्लाना है..
मौत के सायों के बचेखुचे पुर्जे हैं..
हार जीत के जश्न मातम की तस्वीरें हैँ..
जलते काले धुँए के निशाँ हैं..
अपने ही जिस्म को, तारों के ,
नुकीले नाखूनों से नोचने वाली यादें हैँ..
कितने ही माँओं की दुआओं के,
टूटी हुई रंगीन चुड़ियों के अफ़साने हैं.!!

उनकी बातों में…
हमवतनों को बिछड़वाने का ग़म है..
मजबूरी से लिपटी हुई आहें हैं..
जमीं और आसमाँ के बीच फैले हुए
अकेलेपन की खलिश है..
मजहबों के वजूद को
ढूंढ़ने की बेतहाशा जिद है..
फ़िज़ाओं के नगमों को
समझने की कोशिश है..
और शुक्रगुज़ारी..की..इंसानों के अलावा
किसी और को बाँटने का जिम्मा ना मिला..!!

उनकी आवाजों में…
वो पूछती हैं सवाल,
आज़ादी के मतलब वाला..
इंतकाम की आग को,
अंजाम का अक्स दिखाती हैं..
तोलती हैं नफरतों को,
लहू के तालाबों से..
अमन के आफ़ताब को,
तसव्वुर में  सजाती हैं..
पुकारती हैं क़ायनात को
सारी तकलीफें समेटकर..
ताकि आवाज़ों की गूँज,
सारी हदें पार कर जाए…!!

इन सारी आवाजों की सिलवटों में
दफ़्न है..
एक लंबी ख़ामोशी..
जो मांगती है हिसाब,
सरहदों के होने या ना होने का!!!

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4 thoughts on “सरहदें

  1. AAh..या सर्व कोलहला मागे दबलेल्या त्या “खामोशी” चा आवाज खरा तर कानठळ्या बसवणारा आहे..फक्त तो ऐकायची इच्छा आणि संवेदनशीलता हवी. But Who Cares ?

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  2. तो आवाज नेमका पोहोचणं खूप महत्त्वाचं..पण कर्णबधिर व्यवस्थेबद्दल कोण काय बोलणार??एनीवे..धन्यवाद!!

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  3. बहुत ही कमाल लिखा है आपने
    मैने भी सरहदे और नफरतें लिखा है मगर आपकी सरहदों के आगे कुछ नही है।आप अगर फुर्सत पाये तो एक नजर गौर फरमा लें ।

    Liked by 1 person

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