किताबें

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क़िताबें कुछ मांगती नहीं हैं
‘चैरिटी’ करना तो कोई इनसे सीखे..

हर सफ़हे पर हीरे मोती जवाहरात,
जितने चाहे..ले लो..
हर वक़्त लफ्जों का ज़ायका
जुबाँ को अलग मिठास चखाता है..

स्याही से रंगे हुए हर्फ़ ले जाते हैं
ख़यालों की दुनिया के सैर पर,
लकीरों के दरमियाँ की जगह समेटती है
जिंदगी के ग़म,खलीशें,परेशानियों को..

इल्म के चरागों में तेल इन्हीं का है
जो माद्दा रखता है,उम्र को मानी देने का,
अल्फाज़ उतरते हैं नस्लों में खूँ की तरह
अफ़साने दोहराए जाते हैं,वक़्त के दूसरे सीरे पर..

अगरचे झरोकों से गुजरती एक किरन
रौशन कर दे महल को,
परवरदिगार ने न जाने कितने
आफताब जलाकर किताबें बनायी हैं…!!!

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4 thoughts on “किताबें

  1. Exactly.. we owe a lot to books.. “लकीरों के दरमियाँ की जगह”…हे मात्र वाचता आलं पाहिजे … Too good !!!!

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