रुतबा


एक जादू-सा अंदाज़ है..

नज़्में उसकी उंगली थामे चलती हैं,

तरानों को खुदी का एहसास कराता है,

किताबों की सफ़हे पलटने के शोर को

अपने चंद मिसरों में कैद करता है,

सरहदों पे होते हैं ख़ूँ कुछ ख़्वाबों के

तो ज़ख्म से कराहते हैं इसके अल्फ़ाज़,

शिकायत है किसी यार जुलाहे से,किसी तरक़ीब की,

तो किसी चुप से शायर की ख़ुदकुशी पे सवाल करता है,

ग़ालिब,अमृता,इमरोज के नाम अक़ीदत से

नज़्मों में पिरोकर और भी जाविदाँ करता है,

तपाता है दर्दों की दोपहर कोई,

ताकि रूह को छाँव मिले,कुंदन हो,

तसव्वुर के रंगों को कलम की स्याही में ढालकर

लगाता है चक्कर फलक,सय्यारों,क़ायनात के,

पूरनमासी के रात में,मद्धम आवाजों में

पुकारता है किसी हमनशीं हमदर्द को,

वक़्त के कैनवास पे उतारता है हर्फों की हसीन पोर्टरेट

तो सिर्फ इत्मीनान नहीं होता,रूह निहाल होती है,

चाँद को तो जैसे किराए पे ले रखा हो

या कभी यूँ लगे,की इसी की जागीर है वो सिक्का,

शफ़्फ़ाफ़ लम्हे जब खयालों के सुबुक लम्स पाते हैं

तो तामीर होती हैं इसकी कुछ नज़्में,जो मानी दें हयात को,

सफ़ेद उम्र,लिबास में,जब बयाँ करता है कोई ताज़ातरीन त्रिवेणी

गूँज उठता है समाँ,सन्नाटे को आवाज मिलती है,

न जाने कितनी नस्लें एहसानमंद होंगी इसकी

कितनी सदियों की जुबाँ पर इसके नज़्मों का लुत्फ़ रहेगा,

एक फरिश्ते जैसा रुतबा है इस सुखनवर का,

दुनिया इसे ‘गुलज़ार’के नाम से जानती है..!!!

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19 thoughts on “रुतबा

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