रूह को राहत देने वाला शायर

मुशायरे के मंच पर चुनिंदा लोग ..श्रोताओं में कुछ चुप्पी कुछ उदासी ..माहौल में भारीपन भरा हुआ.. एक के बाद एक शायर लोग अपनी ग़ज़ल कहकर जगह पकड़ लेते हैं .फिर एक नाम पुकारा जाता है..अचानक से हड़बड़ाहट पैदा होती है.. लोगों के तालियों सीटीयों और जिंदाबाद के नारों से समा गूंज उठता है.फिर उस शख्स के एक इशारे से खामोश होकर उसकी गजलों की बारिश में भीगते हुए तारीफों के पुल बांधते मुरीद बन जाते हैं. पिछले पांच दशक से इसी तरह से मुशायरा लूट लेने वाले अहद-ए-हाजिर के मशहूर-ओ- मारूफ शायर राहत इंदौरी साहब अब हमारे बीच नहीं रहे.

इंदौर में जन्मे राहत कुरैशी ने नूतन स्कूल में शिक्षा प्राप्त करने के बाद इंदौर विश्वविद्यालय से उर्दू में और ‘उर्दू मुशायरा’ शीर्षक से पीएचडी की डिग्री हासिल की. शुरुआती दौर में घरेलू हालत खस्ता होने के कारण वह सड़कों पर लिखावटी एवं चित्रकारिता का भी काम करते थे.साथ में शायरी में भी गजब दिलचस्पी रखते थे. एक मुशायरे के दौरान नामचीन शायर जाँनिसार अख्तर साहब (जावेद अख्तर साहब के वालिद) से मुलाकात हो गई.ऑटोग्राफ लेते समय उन्होंने अपनी शायरी के दिलचस्पी का जिक्र किया तो जाँनिसार साहब मुस्कुरा कर बोले, मियां, शेर लिखने से पहले 1000 शेर मुंह जबानी याद कीजिए. तपाक से इंदौरी साहब बोले वह तो मुझे पहले से ही याद है जवाब में जानिसार साहब फ़रमाए, तो देर किस बात की है, फौरन लिखना शुरू कीजिए.फिर कभी राहत इंदौरी साहब ने पीछे मुड़कर नहीं देखा. कहा जाता है कि उनकी शायरी पर मशहूर शायर कैसर इंदौरी साहब का बड़ा प्रभाव था,जिसके चलते उन्होंने शायरी की बारीकियों को समझा, फिर अपने अंदाज़ से चार चाँद लगाते गए.

उर्दू अदब के चाहने वालों ने राहत साहब की शायरी और गजलों को बेहिसाब मोहब्बत बक्शी .उनकी शायरी में वतन से इश्क, सियासत से नाराजगी और नौजवानों की उलझन साफ नजर आती है. इसी के चलते लंबे अरसे तक, बच्चों से बुजुर्गों तक उन्हें काफी पसंद किया जाता था.

भाषा की गहरी समझ ,आवाज के माहिराना उतार-चढ़ाव और शेर पढ़ने का अपना एक निराला अंदाज श्रोताओं को दीवाना बना देता था. जिंदगी की आम बातों को स्वच्छता और सलीके से गजलों में कहा जाना उनकी खासियत थी.

आँखों में पानी रखो,होटों पे चिंगारी रखो

जिंदा रहना है तो तरकीबें बहुत सारी रखो

अपनी रचनाओं में मोहब्बत की खुशबू गूंधने वाले राहत साहब तमाम जवां दिलों की धड़कनों को भलीभांति समझ कर अपने कलम में कैद करने का माद्दा रखते थे.उन्हीं द्वारा लिखित एक किताब ‘दो कदम और सही’ में वे कहते हैं…

उसकी याद आयी है,साँसों जरा धीरे चलो

धड़कनों से भी इबादत में ख़लल पड़ता है

या फिर उन्हीं का लिखा एक और शेर उनकी इश्कजदा कारागिरी की मिसाल है..

कल तेरा ज़िक्र छिड़ गया था घर में

और घर देर तक महकता रहा

मुश्किलों भरी निजी जिंदगी के साए कलम की स्याही पर रेंगने पर वह खुद को नहीं रोक पाते थे. बीते दौर की कठिन घड़ियां और मौजूदा हालात की बेबसी उनके लफ़्ज़ों को तीखापन प्रदान करती थी.

जुबाँ तो खोल,नज़र तो मिला, जवाब तो दे

मैं कितनी बार लूटा हूँ,हिसाब तो दे

कई दफा राहत साहब कहते थे ,मेरा शहर अगर जल रहा है और मैं कोई रोमांटिक गजल गा रहा हूं तो अपने फन अपने देश अपने वक्त से दगा कर रहा हूं .नए दौर के हुक्मरानों से तीखे सवाल करके आम आदमी की हालात का मुआयना कर ‘साहिबे मसनदों’ को जगह दिखाने का काम उन्होंने बखूबी निभाया.

जो आज साहिबे मसनद हैं, कल नहीं होंगे

किरायेदार हैं, जाती मकान थोडी है,

सभी का खून शामिल है, यहाँ की मिट्टी में

किसी के बाप का हिन्दोस्तान थोडी है!

अपने वतन की फिक्र करते रहे राहत साहब मौकापरस्त सरकारों की नीतियों पर कड़ा प्रहार करते थे. मजहबी वारदातें,बढ़ती द्वेषमूलक मानसिकता, दहशती माहौल से वे आए दिनों सख्त नाराजगी बेबाक़ी से जताते रहे.मुल्क से बेइंतेहा प्यार उनके शायरी में कई बार झलकता है.

जब मैं मर जाऊं तो मेरी अलग पहचान लिख देना

लहू से मेरे माथे पर हिन्दोस्तान लिख देना!!

देश के नौजवानों से उन्हें कई उम्मीदें थी, पर दिन-ब-दिन उनकी बदहाली ,बेबसी पर भी वह खुलकर बोला करते थे.व्यवस्था की खामियों पर उंगली उठाकर तब्दीली की जोरदार अपील भी उन्होंने की.बेहतर राष्ट्र की नींव रखने से पहले युवाओं के सक्षमीकरण की मांग को ऊंची आवाज में बुलंद किया.

कॉलेज के बच्चे चुप हैं काग़ज़ की एक नाव लिए

चारों तरफ दरिया की सूरत फैली हुई बेकारी है

इंदौर विश्वविद्यालय में प्रोफेसरी करते-करते उन्होंने कई फिल्मों के खूबसूरत गाने लिखे. पर फिल्मी दुनिया उन्हें रास नहीं आई. उर्दू साहित्य जगत में राहत साहब ने लिखी हुई ‘नाराज़’,’चाँद पागल है’,’रुत’,मेरे बाद’ जैसे कई किताबों ने काफी वाहवाही बटोरी, अपना एक अलग मुकाम हासिल किया.मुशायरों में उनका रोम-रोम निखरता था. वे उसी के लिए बने थे.हाल ही में उन्होंने मुशायरों के जरिए अवाम में इल्म की रोशनी बिखेरने के बजाए सस्ते मनोरंजन को बढ़ावा देने के रवैय्ये से सख्त नाराज़गी जाहिर की थी.आला दर्जे की हिंदी उर्दू गजल की आवाज आम आदमी से वाकिफ कराने वाले चुनिंदा मशहूर शायरों में उनका काफी ऊंचा स्थान रहा.

उनके द्वारा लिखे गए शायरी में ‘मौत’ ने काफी बार दस्तक दी है. मूलतः गंभीर पर मुलाकातों में खुशमिजाज किस्म के इस शख्सियत ने मौत से संबंधित कई पहलू बेहतरीन ढंग से उजागर किए. अपने जीते जी अपनी मौत, अपनी मजारों के मंजर बयान करने वाला शख्स दुनिया में जिंदादिली पैदा करता गया.

दो गज़ ही सही,मेरी मिल्कियत तो है

ऐ मौत, तूने मुझे जमींदार कर दिया

आज उर्दू गजल के काफ़िये,मतले,रदीफ़ गमगीन हैं.राहत साहब के चहेतों को इस सदमे से उभरना काफी मुश्किल होगा. पिछले बरस एक मुलाकात में उन्होंने कहा था,’मैं अक्सर सोचता हूँकि ऐसी दो लाइनें अब तक नही लिखीं,जो 100 साल बाद भी मुझे जिंदा रख सके, जिस दिन यह ख़बर मिले की राहत इंदौरी रुख़सत हो गए हैं, समझ जाना कि वो मुकम्मल दो लाइनें मैंने लिख ली हैं. आप देखियेगा मेरी जेबें.. मैं वादा करता हूँ..वो दो लाइनें आपको मिल जाएंगी’..!!

आने वाली पीढ़ियां इस हुनरमंद शख्स और उसकी शायरी को किन गहराईयों तक जाकर देखेंगी,यह तो वक्त ही बताएगा. पर हिंदी उर्दू ग़ज़ल की तहजीब की मंजिल इस बेमिसाल शायर के मीनार के बिना हमेशा ही अधूरी रहेगी.अलविदा राहत साहब….. खुदा आप को जन्नत नसीब फरमाए…. आमीन..!!!

अब ना मैं हूँ, ना बाकी हैं जमाने मेरे

फिर भी मशहूर हैं शहरों में फ़साने मेरे!!

One thought on “रूह को राहत देने वाला शायर

  1. बेहद खूबसूरत फसाना है इंदौरी साहब का।मैं उनकी शायरी की बहुत दीवानी हूं।अक्सर उन्हे सुनती हूं।उदासियों को भी मुस्कुराहटों में तब्दील कर देते हैं।फ़ना हो गये पर जिन्दगी-ए- शायरी हमारे लिये छोड़ गये हमारी साँसों की खातिर।

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